उत्तर प्रदेशप्रतापगढ़

दीपावली में यहां होती है गौरा-गौरी (शिव-पार्वती) की पूजा, मूर्तियों को अंतिम रूप देने में जुटे मूर्तिकार

प्रतापगढ़। मूर्ति बनाने वाले कारीगर को आशा है कि इस बार मूर्ति स्वदेशी लोग खरीदेंगे। दीपावली के दिन लोग अपने घरों में गणेश जी और लक्ष्मी जी की मूर्ति रखकर की लोग अपने घरों में पूजा करते हैं। और अपनी सुख समृद्धि की कामना करते हैं। गांवों सहित शहर के कुछ वार्डों में गौरा जगाने की रस्म शुरू होने के बाद उल्लास का माहौल बनने लगता है। मूर्तिकार महिला फूल कुमारी प्रजापति ने बताया कि हम लोग पूरे परिवार के साथ मिलकर दिपावाली आने से 4 माह के पहले से ही मूर्ति बनाने का काम शुरू कर देते हैं। लेकिन इस बार कोविड 19 की वजह से बिजनेस पर बहुत ज्यादा फर्क पड़ा है इस लिए बस कुछ हफ़्तों से है मूर्ति बनाने का कार्य किया जा रहा है। इस बार कोरोना वायरस की वजह से थोड़ा फीका जरूर हुआ है। वही या काम 10 सालों से करती चली आ रही है।

वही छोटे-छोटे बच्चे भी मूर्ति बनाने में बड़ी उत्साह के साथ जुटे हुए है मूर्ति बनाने की कला छोटे छोटे बच्चों ने भी सिख लिया है। बच्चों निखिल प्रजापति ने बताया कि लॉकडाउन के कारण स्कूल बंद होने की वजह से हम लोग घरों में है। तो अपने दादा दादी और मम्मी पापा का हाथ थोड़ा हम लोग भी बटा लेते हैं चाचा हमें मूर्ति बनाने का काम सिखाया है और हम भी आज मूर्ति बना रहे हैं और इसके साथ पढ़ाई भी करते हैं। हम लोगों का यही एक कमाने और खाने का जरिया है।

वहीं एक छोटी सी बच्ची भी मूर्ति बनाने का काम कर रही है जहां बच्ची नेहा का कहना है कि हम लोग का परिवार जब दीपावली आने वाली रहती है तो उसके कुछ महीनों पहले से ही तैयारियां में जुट जाते हैं पेंटिंग वगैरह करके मूर्ति को अंतिम रूप दिया जाता है उसके बाद मार्केट में बेची जाती है। महिलाएं एकत्रित होकर देव जागरण के लिए पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। मूर्तिकार रामा देवी का कहना है कि इस बार कोरोना वायरस के कारण थोड़ा बहुत धंधा ही का तो हुआ है पूरे परिवार के साथ चार-पांच महीने पहले से ही मूर्ति बनाने का काम शुरू कर देते हैं यह काम पुश्तैनी से करते चले आ रहे हैं और दुकान लगेगी कि नहीं लगेगी इसका कुछ कह पाना मुश्किल नहीं है अबकी बार मूर्ति कम बना पाऐ है।, भगवती प्रसाद कुंभकार ने बताया कि दीपावली में गौरा-गौरी पूजन के लिए सीमित संख्या में मूर्तियां बनाने का का काम हम 4 महीना पहले से ही शुरु कर देते हैं। और इस बार करो ना वायरस के कारण ज्यादा मूर्ति हम लोग नहीं बना रहे हैं क्योंकि दुकान लगेगी या ना लगेगी या भी असमंजस बना हुआ है लेकिन इस बार आशा है कि कुछ ना कुछ ज्यादा बिक्री होने की मूर्ति की आसार है। लगभग 10 से ₹15000 बचत हो जाएगी। शहर में मूर्तियों की बिक्री होती है।

मूर्तिकार इन मूर्तियों को पूरे दिन पूरी तल्लीनता के साथ मनाने में जुटे हुए हैं। पहले तालाब की मिट्टी को तैयार किया जाता है। इसके बाद मूर्ति का आधार बनाने हैं। आधार पर मिट्टी की तह लगाकर उसे एक आकार दिया जाता है। इसके बाद इसे सुखाया जाता है। सूखने के बाद मूर्तियों के ऊपर सफेद पर्त चढ़ाई जाती है। इसके बाद मूर्तियों की सजावट शुरू होती है। अलग- अलग खूबसूरत रंगों से मूर्तियों को आकार दिया जाता है। इन मूर्तियों को पूरा तैयार करने की प्रक्रिया में एक सप्ताह का समय लग जाता है।

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