उत्तर प्रदेशवाराणसी

उगते सूर्य को अर्घ देने के साथ ही छठ पूजा का समापन

वाराणसी। चार दिनों के कठिन व्रत का आज उगते सूरज को अर्घ देने के साथ समापन हुआ, भगवान भाष्कर के रश्मियो के बिखरे आभा मंडल के आधार के साथ ही व्रतीओ ने दूध से अर्घ दिया। बनारस के  घाटो पर रात तीन बजे से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था, व्रती महिलायो के साथ ही परिजन भी सूर्य उदय का इंजतार करते नजर आये ठीक 6 बजकर 26 मिनट पर भक्तो ने गाय के दूध का अर्घ देने के साथ अपने अपने घरो के ओर बढ़ चले। घर जाकर महिलायें अब इस व्रत का समापन करेंगी। मान्यताओं के अनुसार, छठ के घाट पर जाना और दर्शन करने का भी विशेष महत्त्व माना जाता है लिहाजा तमाम ऐसे भक्त भी थे जो आज उगते सूर्य के दर्शन कर अपने मनोरथ को पूरी करने कि लालसा से पहुंचे थे।

Completion of Chhath Puja with offering of Argh to Rising Sun in varanasi

महाभारत काल से आरंभ-

सूर्यषष्ठी व्रत आरंभ महाभारत काल द्वापर में सर्वप्रथम कुंती ने सूर्य की आराधना कर किया था। सूर्यदेव के आशीर्वाद से कुंती को पुत्र रूप में कर्ण प्राप्त हुए थे। कर्ण ने भी सूर्य आराधना की। उनके आशीर्वाद से वे परमयोद्धा बने। कार्तिक मास में सूर्य आराधना का ज्योतिषीय कारण यह कि इस मास में सूर्य देव का अपनी परम नीच राशि तुला पर संचरण रहता है। वहीं ज्योतिष शास्त्र में पंचम भाव संतान का भाव माना जाता है जहां पर काल पुरुष की पांचवीं राशि सिंह राशि का आधिपत्य होता है जिसके स्वामी ग्रह भगवान सूर्य को माना जाता है। संतान बाधा होने पर कुंडली में कहीं न कहीं ग्रह राज सूर्य पीड़ित या कमजोर होते हैं। ऐसे में ज्योतिष शास्त्र में संतान प्राप्ति के लिए सूर्य आराधना विशेष बताई गई है। इसमें सूर्य को अघ्र्य, व्रत-पूजन, वंदन, हरिवंश पुराण श्रवण आदि का महत्व है। इसलिए ही वर्ष भर में सूर्योपासना के छह पर्व पड़ते हैं और सभी संतान प्राप्ति के लिए होते हैं। कार्तिक मास प्रयत्न सूर्य को अर्घ देने, विशेषकर षष्ठी के दिन ऐसा करने से सूर्यदेव प्रसन्न होकर संतान को दीर्घायु व संतान प्राप्ति का वरदान देते हैं।

Completion of Chhath Puja with offering of Argh to Rising Sun in varanasi

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