उत्तर प्रदेशप्रतापगढ़

अद्भुत विशेषता और चमत्कारों को लेकर बेल्हा देवी मंदिर है लोगों के आस्था का केन्द्र

प्रतापगढ़। दुनिया के हर कोने में मंदिर, तीर्थस्थल आदि पाए जाते हैं। इन मंदिरों का अपने आप में प्रसिद्धी हासिल है। आज हम बात करेंगे ऐसे ही मंदिर के बारे में जो बहुतब प्रसिद्ध है। वैसे तो देश में देवी मां के अनेकों मंदिर है, जिनकी अपनी अलग विशेषता है। लेकिन इनमें ज्यादा महानता इनके शक्तिपीठों की है। बता दें कि शक्तिपीठ उन मंदिरों को कहा जाता है, जहां देवी पार्वती के शरीर के अंग गिरे थे। तो आज हम आपको ऐसे ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे देवी के शक्तिपीठों में से एक माना गया है। वही करो ना को लेकर के भी मंदिर परिसर के पुजारी भी सतर्क हैं सैनिटाइजर मंदिर परिसर के मुख्य गेट पर लगाया गया है। सैनिटाइज होकर ही लोगों को मंदिर के अंदर प्रवेश करने की अनुमति दी जा रही है

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में अपनी अद्भुत विशेषता और चमत्कारों को लेकर बेल्हा देवी मंदिर जोकि यहां के लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। वही मां बेल्हा देवी के पुजारी मनोज पंडित का कहना है कि आपको बता दें कि इस मंदिर का नाम बेल्हा इसलिए कहा जाता है कि क्योंकि यहां देवी मां की कमर (बेला) गिरी थी। लोक मान्यता के अनुसार जो भी भक्त देवी मां से अपनी मनोकामनाओं लेकर आते हैं, मां बेल्हा देवी उन्हें ज़रूर ही पूरी करती हैं। यहां रोज़ाना मां का श्रृंगार किया जाता लेकिन नवरात्रों में मां के अलग-अलग स्वरूपों का श्रृंगार इतना खूबसूरत तरीके से किया जाता। हर मंदिर की तरह यहां भी रात में और सुबह आरती की जाती है। बेल्हा देवी मंदिर में बच्चों का मुंडन, कर्ण छेदन आदि संस्कार और अन्य सभी तरह के मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं।बेल्हा मंदिर को लेकर लोगों का मानना है कि यहां श्री राम ने अपने वनवास के दौरान त्रेता युग में वनगमन मार्ग के किनारे सई नदी को पार किया था और यहीं पूजन कर अपने संकल्प को पूरा करने के लिए ऊर्जा ली थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार चित्रकूट से अयोध्या लौटते समय श्रीराम के भाई भरत ने यहां पूजन किया था। जिसके बाद ही मंदिर लोगों के अस्तित्व में आया और इसके प्रति लोगों की आस्था बढ़ गई।

इन सबके अलावा मंदिर का इतिहास ये भी कहता है कि यहां के चाहमान वंश के राजा पृथ्वी राज चौहान की एक बेटी बेला थी जिसका विवाह इसी क्षेत्र के ब्रह्मा नामक एक युवक से हुआ था। परंतु बेला के विदाई के ही दिन उसके पति की मृत्य हो गई। बेला इस गम को बर्दाश नहीं कर पाई और उसने नदी में कर खुद को सती कर लिया। इसीलिए इस जगह को सती स्थल के नाम से भी जाना जाता है। वहीं श्रद्धालुओं अनुराग कुमार खरे का कहना है कि यह बहुत पुरानी मंदिर है जो कि पूर्वजों की जमाने की मां बेल्हा देवी की मंदिर है और हम लोग यहां दर्शन करने के लिए आते हैं जो भी मनोकामना यहां श्रद्धालु अपने सच्चे मन से मांगता है वह उसकी मनोकामना पूरी होती है मां के द्वारा बाबू मेला का भी आयोजन यहां होता है सोमवार और शुक्रवार को श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं। वहीं कोरोना को लेकर के भी लोग सतर्क दिखाई दे रहे हैं मंदिर के अंदर प्रवेश करने से पहले सैनिटाइजर की मशीन लगाई गई है। सेनीटाइज होने के बाद ही श्रद्धालु को अंदर जाने की अनुमति दी गई है।

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